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दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय

दोस्तों आज हम इस आर्टिकल के माध्यम से जानेगे स्वामी दयानंद सरस्वती के बारे में और इनसे जुडी कुछ अहम् जानकारी भी आपसे साझा करेंगे|स्वामी जी आधुनिक भारत के महान चिन्तक, समाज-सुधारक व देशभक्त थे| उनका बचपन का नाम ‘मूलशंकर’ था|उन्होंने ने 1875 में एक महान आर्य सुधारक संगठन आर्य समाज की स्थापना की| वे एक संन्यासी तथा एक महान चिंतक थे| उन्होंने वेदों की सत्ता को सदा सर्वोपरि माना| स्वामीजी ने कर्म सिद्धांत, पुनर्जन्म, ब्रह्मचर्य तथा सन्यास अपने दर्शन के चार स्तम्भ बनाया|उन्होने ही सबसे पहले 1876 में ‘स्वराज’ का नारा दिया जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया|

दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय

स्वामी दयानंद सरस्वती जी एक समाज सुधारक और व्यावहारिकता में विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे|आप सभी जानते है उन्होंने हिन्दू धर्म के कई अनुष्ठानो के खिलाफ प्रचार किया| उन अनुष्ठानो के खिलाफ प्रचार करने के कुछ मुख्य कारण थे मूर्ति पूजा, जाति भेदभाव, पशु बलि, और महिलाओं को वेदों को पढने की अनुमति ना देना|इस तरह आपने बहुत से सराहनीय काम किये और देश को ऊँचा उठाया|वो ना सिर्फ एक महान विद्वान और दार्शनिक थे बल्कि वो एक महान समाज सुधारक और राजनीतिक विचार धरा के व्यक्ति थे| स्वामी दयानद सरस्वती जी के उच्च विचारों और कोशिश के कारण ही भारतीय शिक्षा प्रणाली का पुनरुद्धार हुआ जिसमें एक ही छत के नीचे विभिन्न स्तर और जाति के छात्रों को लाया गया जिसे आज हम कक्षा के नाम से जानते हैं|अब आइये जानते है सरस्वती जी का जीवन परिचय|

स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय –

दोस्तों स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फ़रवरी सन् 1824 में गुजरात में हुआ था|उनके पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी और माँ का नाम यशोदाबाई था| उनके पिता एक कर-कलेक्टर होने के साथ ब्राह्मण परिवार के एक अमीर, समृद्ध और प्रभावशाली व्यक्ति थे| दयानंद सरस्वती का असली नाम मूलशंकर था और उनका प्रारम्भिक जीवन बहुत आराम से बीता| आगे चलकर एक पण्डित बनने के लिए वे संस्कृत, वेद, शास्त्रों व अन्य धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन में लग गए|उनके पिता शिव जी के बहुत बड़े भक्त थे और उनके पिता ने दयानद जी को यह भी बताया था की उपवास रखने के फायदे क्या हैं इसलिए दयानंद जी सभी शिवरात्रि को उपवास रखते थे और पूरी रात शिव पूजा में सम्मिलित रहते थे|

आपको बताये 1846 में सरस्वती जी अपने घर से भाग गए ताकि उनका विवाह बली काल में ना कराया जा सके और उन्होंने अपना जीवन कई साल तक तपस्वी के रूप में धर्म के सत्य को ढूंढते हुए भटकते रहे|22 अक्टूबर 1869 को वाराणसी, में स्वामी दयान्द जी ने एक 27 विद्वानो और 12 पंडित विशेषज्ञों के खिलाफ एक बहस में जीत हासिल किया|इस बहस को देखने 50,000 से भी ज्यादा लोग देखने आये थे|महर्षि दयानन्द के हृदय में आदर्शवाद की उच्च भावना, यथार्थवादी मार्ग अपनाने की सहज प्रवृत्ति, मातृभूमि की नियति को नई दिशा देने का अदम्य उत्साह, धार्मिक-सामाजिक-आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि से युगानुकूल चिन्तन करने की तीव्र इच्छा तथा आर्यावर्तीय (भारतीय) जनता में गौरवमय अतीत के प्रति निष्ठा जगाने की भावना थी| उन्होंने किसी के विरोध तथा निन्दा करने की परवाह किये बिना आर्यावर्त (भारत) के हिन्दू समाज का कायाकल्प करना अपना ध्येय बना लिया था|

दयानंद सरस्वती जी की शिक्षा –

दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय

बहुत से स्थानों में भ्रमण करते हुए इन्होंने कतिपय आचार्यों से शिक्षा प्राप्त की। वे सर्वप्रथम वेदांत के प्रभाव में आये तथा आत्मा एवं ब्रह्म की एकता को स्वीकार किया| ये अद्व्येत मत में दीक्षित हुए एवं इनका नाम ‘शुद्ध चैतन्य” पड़ा|तद पश्चात ये सन्न्यासियों की चतुर्थ श्रेणी में दीक्षित हुए एवं यहाँ इनकी प्रचलित उपाधि दयानन्द सरस्वती हुईफिर इन्होंने योग को अपनाते हुए वेदान्त के सभी सिद्धान्तों को छोड़ दिया|इनके जीवन एक नया मोड़ आया और वे घर से निकल पड़े और यात्रा करते हुए वह गुरु विरजानन्दके पास पहुंचे|

गुरु जी ने उन्हें पाणिनि व्याकरण, पातंजल योगसूत्र तथा वेद वेदांग का अध्ययन कराया| गुरु दक्षिणा में उन्होंने मांगा विद्या को सफल कर दिखाओ, परोपकार करो, सत्य शास्त्रों का उद्धार करो, मत मतांतरों की अविद्या को मिटाओ, वेद के प्रकाश से इस अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करो, वैदिक धर्म का आलोक सर्वत्र विकीर्ण करो| यही तुम्हारी गुरुदक्षिणा है| उन्होंने आशीर्वाद दिया कि ईश्वर उनके पुरुषार्थ को सफल करे| उन्होंने अंतिम शिक्षा दी मनुष्यकृत ग्रंथों में ईश्वर और ऋषियों की निंदा है, ऋषिकृत ग्रंथों में नहीं|आप सभी को बताना चाहूगा की इसका वेद प्रमाण हैं| इस कसौटी को हाथ से न छोड़ना|वर्तमान में केवल पांडुरंग शास्त्री उनमें से एक है जो आर्य समाज की तरह काम कर रही है|

आर्य समाज की स्थापना –

दोस्तों आपको बताये 1863 से 1875 ई. तक स्वामी जी देश का भ्रमण करके अपने विचारों का प्रचार करते रहें| उन्होंने वेदों के प्रचार का बीड़ा उठाया और इस काम को पूरा करने के लिए 7 या 10 अप्रैल 1875 ई. को ‘आर्य समाज’ नामक संस्था की स्थापना की|बहुत जल्द इसकी शाखाएं देश-भर में फैल गई| देश के सांस्कृतिक और राष्ट्रीय नवजागरण में आर्य समाज की बहुत बड़ी देन रही है| हिन्दू समाज को इससे नई चेतना मिली और अनेक संस्कारगत कुरीतियों से छुटकारा मिला| स्वामी जी ने बाल विवाह का विरोध किया और नारी शिक्षा तथा विधवा विवाह प्रोत्साहित किया| उनका कहना था कि किसी भी हिन्दू को हिन्दू धर्म में लिया जा सकता है इससे हिंदुओं का धर्म परिवर्तन रूक गया|आज भी लोग इनके कामो का गुणगान करते है|

रचनाएँ –

  • सत्यार्थप्रकाश (संस्कृत)|
  • रत्नमाला|
  • पाखण्ड खण्डन|
  • ऋग्वेद भाष्य|
  • वेद भाष्य भूमिका|
  • अद्वैतमत का खण्डन|
  • पंचमहायज्ञ विधि|
  • वल्लभाचार्य मत का खण्डन आदि|

मृत्यु –

दोस्तों सन 1883 में स्वामी दयानंद सरस्वती को जोधपुर के महाराज नव दीपावली पर न्योता दिया| महाराज उनके शिष्य बनना चाहते थे और उनसे शिक्षा भी लेना चाहते थे|एक दिन दयानंद सरस्वती जी महाराज के विश्राम गृह में गए तो उन्होंने वहां देखा कि महाराज एक नाचने वाली महिला  नन्ही जान के साथ पाए गए| दयानंद जी महाराज को महिला के अनैतिक कार्यों से दूर रहने के लिए कहा|इस बात से उस महिला को बहुत बुरा लगा और उसने दयानंद जी से बदला लेने का सोचा| उसने दयानंद जी के लिए खाना बनाने वाले रसौइए को घुस दिया और दूध के गिलास में कांच के टुकड़े मिला दिया|दयानंद जी को को  वह दूध पीने के लिए दिया गया| दूध पीते ही स्वामी दयानंद सरस्वती के मुख से खून निकलने लगा| जब महाराज को यह बात पता चला तो उन्होंने बहुत कोशिश किया डॉक्टरों को भी बुलाया परन्तु  उनकी हालत और ख़राब होती गयी|30 अक्टूबर 1883 को मन्त्रों का जप करते हुए उनकी मृत्यु हो गई और परम लोक को सिधार गए|

दोस्तों ऐसे ऐसे महापुरुष हुए है भारत में जिन्होंने अपने देश का गौरव पुरे विश्व में बढाया ऐसे ही थे सरस्वती जी|अब मै समझ सकता हु आप सभी को मेरा ये पोस्ट अच्छा लगा होगा और अगर आपने इसे अच्छे से पढ़ा होगा तो जरुर आपको समझ में आ गया होगा और अगर अभी भी आपको कुछ पूछना हो तो आ[ message box में लिखकर पूछ सकते है|

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