Category Archives: Featured

Featured posts

पूस की रात

पूस की रात (मुंशी प्रेमचंद्र) – हिंदी कहानी

दोस्तों, आप सभी जानते हैं मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ बहुत प्रसिद्द हैं और इसमें अगर पूस की रात कहानी की बात करें तो ये कहानी बहुत प्रसिद्ध है|आज इस आर्टिकल के माध्यम से हम सभी कहानी पूस की रात पढेंगे मै समझता हूँ आप सभी को बहुत अच्छी लगेगी|आइये हम सभी इस कहानी का मजा लेते हैं|

पूस की रात कहानी 

हल्कू अपनी पत्नी से कहता है – सहना आया है लाओ जो रुपये रखे हैं उसे दे दूं किसी तरह गला तो छूटे|

मुन्नी झाड़ू लगा रही थी|पीछे फिरकर बोली – तीन ही तो रुपए हैं दे दोगे तो कम्बल कहाँ से आयेगा ? माघ पूस की रात हार में कैसे कटेगी ? उससे कह दो फसल पर दे देंगे| अभी नही|

इसे भी पढ़ें – बुजुर्ग का बटुआ (हिंदी कहानी) 

हल्कू एक क्षण अनिश्चित दशा में खड़ा रहा| पूस सिर पर आ गया| कम्बल के बिना हार में रात को वह किस तरह नही जा सकता| मगर सहना मानेगा नही| घुड़कियाँ जमावेगा गालियाँ देगा| बला से जाड़ो में मरेंगे बला तो सिर से टल जाएगी| यह सोचता हुआ वह अपना भारी भरकम डील लिए हुए स्त्री के समीप आ गया और खुशामद करके बोला – ला दे दे गला तो छूटे| कम्बल के लिए कोई दूसरा उपाय सोचूंगा|

मुन्नी उसके पास से दूर हट गयी और आँखें तरेरते हुए बोली – कर चुके दूसरा उपाय जरा सुनू तो कौन सा उपाय करोगे ?कोई खैरात दे देगा कम्बल ? न जाने कितनी बाकी है जो किसी तरह चुकने नही आती| मै कहती हूँ तुम क्यू नही खेती छोड़ देते ? मर मर काम करो उपज हो तो बाकी दे दो चलो छुट्टी हुयी| बाकी चुकाने के लिए ही तो हमारा जनम हुआ है| पेट के लिए मजूरी करो| ऐसी खेती से बाज आये| मै रुपये न दूंगी न दूंगी|

हल्कू उदास होकर बोला – तो क्या गाली खाऊ|

मुन्नी ने तड़फ कर कहा – गाली क्यों देगा क्या उसका राज है|

मगर ये कहने के साथ ही उसकी तनी हुयी भओहें ढीली पद गयी| हल्कू के उस वाक्य में जो कठोर सत्य था वो मानो एक भीषण जंतु का भांति उसे घूर रहा था|

इसे भी पढ़ें – हीन भावना से कैसे बचें| 

उसने जाकर आले पर से रुपये निकाले और लाकर हल्कू के हाथ पर रख दिए| फिर बोली – तुम छोड़ दो अबकी से खेती| मजूरी में सुख से एक रोटी तो खाने को मिलेगी| किसी की धौंस तो न रहेगी| अच्छी खेती है मजूरी करके लाओ वो भी उसी में झोक दो उस पर धौंस|

हल्कू ने रुपये लिए और इस तरह बाहर मानो अपना ह्रदय निकालकर देने जा रहा हो| उसने मजूरी से एक एक पैसा काट कपटकर तीन रुपये कम्बल के लिए जमा किये थे| वो आज निकले जा रहे थे| एक एक पग के साथ उसका मस्तक अपनी दीनता के भार से दबा जा रहा था|

पूस की अँधेरी रात आकाश पर तारे भी ठिठुरते हुए मालूम हो रहे थे| हल्कू अपने खेत के किनारे ऊख के पत्तों की एक छतरी के नीचे बांस के खटोले पर अपनी पुरानी गाढे की चादर ओढ़े पड़ा काँप रहा था| खाट के नीचे उसका संगी कुत्ता जबरा पेट में मुंह डाले सर्दी से कूँ कूँ कर रहा था| दो में से एक को भी नींद नही आ रही थी|

हल्कू ने घुटनियों को गर्दन में चिपकाते हुए कहा – क्यू जबरा जाड़ा लगता है ? कहता तो था घर में पुआल पर लेते रहो| अब लो मजे| जानते थे मै यहाँ हलुआ पूरी खाने आया हूँ| दौड़े दौड़े आगे आगे चले आये| अब रोवो नानी के नाम को|

इसे भी पढ़ें – Best Motivational stories in hindi. 

जबरा ने पड़े पड़े दम हिलाई और अपनी कूँ कूँ को दीर्घ बनाता हुआ एक बार जमाई लेकर चुप हो गया| उसकी स्वान बुद्धि ने शायद जान लिया स्वामी को मेरे कूँ कूँ से नींद नही आ रही है|

हल्कू ने हाथ निकालकर जबरा की पीठ सहलाते हुए बोला – कल से मत आना मेरे साथ नही तो ठन्डे हो जाओगे| ये रांड पछुआ न जाने कहाँ से बर्फ लिए आ रही है उठूं फिर एक चिलम भरू| किसी तरह रात तो कटे आठ चिलम तो पी चूका| ये खेती का मजा है और एक एक भगवान् ऐसे पड़े है जिनके पास जाड़ा जाये तो गर्मी से घबराकर भागे| मोटे मोटे गद्दे लिहाफ कम्बल| मजाल है जाड़े का गुजर हो जाये| तकदीर की खूबी मजूरी हम करें मजा दुसरे लुटे|

हल्कू उठा गड्ढे में से जरा सी आग निकालकर चिलम भरी| जबरा भी उठ बैठा|

हल्कू ने चिलम पीते हुए कहा – पिएगा चिलम जाड़ा तो क्या जाता है जरा मन बदल जाता है|

जबरा ने उसके मुंह की ओर प्रेम से छलकती हुयी आँखों से देखा|

हल्कू – आज और जाड़ा खा ले| कल से मै पुआल बिछा लूँगा उसी में घुसकर बैठना तब जाड़ा न लगेगा|

जबरा ने अपने पंजे उसकी घुटनियों पर रख दिए और उसके मुंह के पास अपना मुंह ले गया| हल्कू को उसकी गर्म साँस लगी|

चिलम पीकर हल्कू फिर लेटा और निश्चय करके लेता कि फिर चाहे कुछ हो जाये अबकी सो जाऊंगा| पर एक ही क्षण में उसके ह्रदय में कम्पन होने लगा| अभी इस करवट लेटता, कभी उस करवट पर जाड़ा किसी पिशाच की भांति उसकी छाती को दबाये हुए था|

जब किसी तरह न रहा गया तो उसने जबरा को धीरे से उठाया और उसके सिर को थपथपाकर उसे अपनी गोद में सुला लिए| कुत्ते की देह से जाने कैसी दुर्गन्ध आ रही थी पर वो उसे अपनी गोद में चिपकाये हुए ऐसे सुख का अनुभव कर रहा था जो इधर महीनो से उसे न मिला था| जबरा शायद ये समझ रहा था कि स्वर्ग यहीं है और हल्कू की पवित्र आत्मा में तो उस कुत्ते के प्रति घृणा की गंध तक न थी| अपने किसी अभिन्न मित्र या भाई को भी वह इतनी सी ही तत्परता से गले लगाता| वह अपनी दीनता से आहत न था| जिसने आज उसे इस दशा पर पहुंचा दिया| नहीं इस अनोखी मैत्री ने जैसे उसकी आत्मा के सब द्वार खोल दिए थे और उनका उनका एक अणु प्रकाश से चमक रहा था|

इसे भी पढ़ें – Quotes on life in hindi.

सहसा जबरा ने किसी जानवर की आहट पायी| इस विशेष आत्मीयता ने उसमे एक नयी स्फूर्ति पैदा कर दी थी जो हवा के ठन्डे झोंकों को तुच्छ समझती थी| वह झपटकर उठा और छपरी से बाहर आकर भौंकने लगा| हल्कू ने उसे कई बार चुमकारकर बुलाया पर वो उसके पास न आया हार में चारों तरफ दौड़ दौड़ कर भूंकता रहा| एक क्षण के लिए आ भी जाता तो तुरंत ही फिर दौड़ता|कर्तव्य उसके ह्रदय में अरमान की भांति ही उछल रहा था|

एक घंटा और बीत गया रात ने सीत को हवा से धधकाना सुरु किया| हल्कू उठ बैठा और दोनों घुटनों को छाती से मिलाकर सिर को उसमे छिपा लिया फिर भी ठण्ड कम न हुयी| ऐसा जान पड़ता था सारा रक्त जम गया है| धमनियों में रक्त के जगह हिम बह रहा है| उसने झुककर आकाश की ओर देखा अभी कितनी रात बाकी है| सप्तर्षि अभी आकाश में आधे भी नहीं चढ़े| ऊपर आ जायेंगे तब कहीं सबेरा होगा| अभी पहर से ऊपर रात है|

हल्कू के खेत से कोई एक गोली के ठप्पे पर आमो का एक बाग़ था| पतझड़ सुरु हो गयी थी बाग़ में पत्तियों का ढेर लगा हुआ था| हल्कू ने सोचा चलकर पत्तियां बटोरूँ और उन्हें जलाकर खूब तापूँ| रात को कोई मुझे पत्तियां बटोरते देख तो समझे कोई भूत है| कौन जाने कोई जानवर ही छिपा बैठा हो मगर अब तो बैठे नही रहा जाता|

इसे भी पढ़ें – Computer पर Guest account कैसे add करे| 

उसने पास के अरहर के खेत में जाकर कई पौधे उखाड़ लिए और उनका एक झाड़ू बनाकर हाथ में सुलगता हुआ उपला लिए बगीचे की तरफ चला| जबरा ने उसे आते देखा तो पास आया और दम हिलाने लगा|

हल्कू ने कहा – अब तो नही रह जाता जबरू| चलो बगीचे में पत्तियां बटोरकर तापें| टाढ़े हो जायेंगे तो फिर आकर सोयेंगे| अभी तो बहुत रात है| जबरे ने स्वीकार कर ली|

पत्तियां जल चुकी थीं| बगीचे में फिर अँधेरा छा गया थ| हल्कू ने फिर चादर ओढ़ ली और गर्म राख के पास बैठा हुआ गीत गुनगुनाने लगा| उसके बदन में गर्मी आ गयी थी पर ज्यों ज्यों शीत बढती जाती आलस्य और बढती|

सबेरे जब नींद खुली तब चारों तरफ धूप खुल गयी थी और मुन्नी बोली आज कितना सोये तुम रम गए और खेत चौपट हो गया| हल्कू ने बहाना किया मै आज मरते मरते बचा तुझे खेत की पड़ी है पेट में इतना दर्द था कि मै ही जनता हूँ|

फिर दोनों खेत की दशा देखने गए और जब देखा तो मुन्नी बहुत उदास थी लेकिन हल्कू प्रसन्न था|

मुन्नी ने कहा – अब मालगुजारी करके पेट पालना है|

हल्कू ने प्रसन्न होकर कहा – रात को ठण्ड में यहाँ सोना तो न पड़ेगा|

दोस्तों, आप सभी ने ये कहानी बहुत पढ़ी होगी मै समझता हूँ आप सभी को ये कहानी बहुत अच्छी लगी होगी अगर आपने अच्छे से पढ़ा होगा| अगर आपको कुछ पूछना हो तो नीचे message के द्वारा पूछ सकते हैं|