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गुरु तेग बहादुर Biography In Hindi

दोस्तों, गुरु तेग बहादुर जी को सभी जानते हैं और शादियों से पढ़ते चले आ रहे हैं सिक्खों के नौवें धर्म गुरु हैं जो की बहुत ही धीर गंभीर और गुणवान कहे जाते हैं|विश्व के इतिहास में धर्म एवं सिद्धांतों की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में इनका अद्वितीय स्थान है|तेग़ बहादुर जी के बलिदान से हिंदुओं व हिन्दू धर्म की रक्षा हुई|हिन्दू धर्म के लोग भी उन्हें याद करते और उनसे संबंधित कार्यक्रमों में भाग लेते हैं|

गुरु तेग बहादुर biography

आपको बताना चाहूँगा गुरु तेग़ बहादुर सिंह 20 मार्च, 1664 को सिक्खों के गुरु नियुक्त हुए थे और 24 नवंबर, 1675 तक गद्दी पर आसीन रहे|आज इस आर्टिकल के माध्यम से मै आपको गुरु तेग बहादुर जी के बारे में बताने जा रहा हूँ साथ ही आपको इनके जीवन से जुडी कुछ रोचक जानकारी भी दे रहा हूँ उम्मीद है आपको बेहद पसंद आएगा|आइये जानते हैं|आपको बताता चलूँ गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान न केवल धर्म पालन के लिए नहीं अपितु समस्त मानवीय सांस्कृतिक विरासत की खातिर बलिदान था|धर्म उनके लिए सांस्कृतिक मूल्यों और जीवन विधान का नाम था| इसलिए धर्म के सत्य शाश्वत मूल्यों के लिए उनका बलि चढ़ जाना वस्तुतः सांस्कृतिक विरासत और इच्छित जीवन विधान के पक्ष में एक परम साहसिक अभियान था|

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गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय –

गुरु तेग बहादुर

पूरा नाम – गुरु तेग़ बहादुर सिंह|

जन्म – 18 अप्रैल, 1621.

जन्म स्थान – अमृतसर, पंजाब|

मृत्यु – 24 नवम्बर 1975|

पिता – गुरु हरगोविंद सिंह|

माता – नानकी|

पत्नी – माता गुजरी|

संतान – गुरु गोविन्द सिंह|

उपाधि – सिक्खों के नौवें गुरु|

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दोस्तों गुरु तेग़ बहादुर जी का जन्म पंजाब के अमृतसर नगर में हुआ था|ये गुरु हरगोविंद सिंह जी के पाँचवें पुत्र थे|आठवें गुरु इनके पोते ‘हरिकृष्ण राय’ जी की अकाल मृत्यु हो जाने के कारण जनमत द्वारा ये नवम गुरु बनाए गए|आपको बताऊ इन्होंने आनंदपुर साहिब का निर्माण कराया और ये वहीं रहने लगे थे|उनका बचपन का नाम त्यागमल था|मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुग़लों के हमले के ख़िलाफ़ हुए युद्ध में उन्होंने वीरता का परिचय दिया|उनकी वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम त्यागमल से तेग़ बहादुर (तलवार के धनी) रख दिया|

युद्धस्थल में भीषण रक्तपात से गुरु तेग़ बहादुर जी के वैरागी मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और उनका का मन आध्यात्मिक चिंतन की ओर हुआ|धैर्य, वैराग्य और त्याग की मूर्ति गुरु तेग़ बहादुर जी ने एकांत में लगातार 20 वर्ष तक ‘बाबा बकाला’ नामक स्थान पर साधना की|आठवें गुरु हरकिशन जी ने अपने उत्तराधिकारी का नाम के लिए ‘बाबा बकाले’ का निर्देश दिया|गुरु जी ने धर्म के प्रसार लिए कई स्थानों का भ्रमण किया|आनंदपुर साहब से कीरतपुर, रोपण, सैफाबाद होते हुए वे खिआला (खदल) पहुँचे|यहाँ उपदेश देते हुए दमदमा साहब से होते हुए कुरुक्षेत्र पहुँचे|कुरुक्षेत्र से यमुना के किनारे होते हुए कड़ामानकपुर पहुँचे और यहीं पर उन्होंने साधु भाई मलूकदास का उद्धार किया|

इसके बाद गुरु तेग़ बहादुर जी प्रयाग, बनारस, पटना, असम आदि क्षेत्रों में गए, जहाँ उन्होंने आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक, उन्नयन के लिए रचनात्मक कार्य किए|आध्यात्मिकता, धर्म का ज्ञान बाँटा|रूढ़ियों, अंधविश्वासों की आलोचना कर नये आदर्श स्थापित किए|उन्होंने परोपकार के लिए कुएँ खुदवाना, धर्मशालाएँ बनवाना आदि कार्य भी किए|इन्हीं यात्राओं में 1666 में गुरुजी के यहाँ पटना साहब में पुत्र का जन्म हुआ। जो दसवें गुरु- गोविन्द सिंह बने|

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औरंगजेब यह सुनकर आगबबूला हो गया|उसने दिल्ली के चाँदनी चौक पर गुरु तेग़ बहादुर जी का शीश काटने का हुक्म ज़ारी कर दिया और गुरु जी ने 24 नवम्बर 1675 को हँसते-हँसते बलिदान दे दिया|गुरु तेग़ बहादुरजी की याद में उनके ‘शहीदी स्थल’ पर गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा ‘शीश गंज साहिब’|

दोस्तों इस तरह गुरु जी ने अपना सारा जीवन त्याग और वलिदान में बिता दिता और अब मै समझ सकता हूँ आप सभी को मेरा ये पोस्ट बहुत अच्छा लगा होगा और आपको गुरु तेग बहादुर जी से जुडी जानकारी भी मिल गयी होग|अगर आपको कुछ पूछना हो तो आप नीचे message के द्वारा बता सकते हैं आपकी पूरी मदद की जायेगी|

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