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जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय

दोस्तों, महाकवि जयशंकर प्रसाद हिन्दी कवि, नाटकार, कथाकार, उपन्यासकार तथा निबन्धकार थे|वे हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं|उन्होंने हिंदी काव्य में छायावाद की स्थापना की जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई और वह काव्य की सिद्ध भाषा बन गई|आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास में इनके कृतित्व का गौरव अक्षुण्ण है|वे एक युगप्रवर्तक लेखक थे जिन्होंने एक ही साथ कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिंदी को गौरव करने लायक कृतियाँ दीं|कवि के रूप में वे निराला, पन्त, महादेवी के साथ छायावाद के चौथे स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित हुए है|

जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय

आपको बताये नाटक लेखन में भारतेंदु के बाद वे एक अलग धारा बहाने वाले युगप्रवर्तक नाटककार रहे|जिनके नाटक आज भी पाठक चाव से पढते हैं|इसके अलावा कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में भी उन्होंने कई यादगार कृतियाँ दीं| विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करूणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन|48 वर्षो के छोटे से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएं की|

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जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय –

जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय

छायावाद के उन्नायक जयशंकर प्रसाद का जन्म सन् 1889 में काशी के सराय गोवर्धन मोहल्ले में सुँघनी साहू नाम के विख्यात वैश्य परिवार में हुआ था|15 वर्ष की आयु में ही प्रसाद जी के माता-पिता और इनके अग्रज शम्भू रत्न जी का देहांत हो गया|इस प्रकार गृहस्थी का सम्पूर्ण दायित्व इनके कन्धों पर एक साथ आ गया|बीस वर्ष की आयु में इन्होंने अपना विवाह किया|पारिवारिक उलझनों के कारण इनकी शिक्षा व्यवस्थित न रह सकी|घर पर ही अपने गुरु रसमय सिद्ध से इन्होंने उपनिषद, पुराण, वेद और भारतीय दर्शन के अध्ययन के साथ-साथ  ही दुकान का कार्य भी संभाला|
प्रसाद जी नित्य साहित्य सृजन किया करते थे|इस प्रकार अपने संयत एवं नियमित जीवन में आशा-निराशा, सुख-दुःख के कठोरतम क्षणों को धैर्य और कर्मठता के साथ सहन करते हुए 48 वर्ष की आयु में सन् 1937 में इनका देहावसान हो गया|

पूरा नाम – जयशंकर प्रसाद|

जन्म – 30 जनवरी 1889|

जन्म स्थान – वाराणसी, उत्तर प्रदेश|

पिता – देवी प्रसाद शाहू|

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जयशंकर प्रसाद जी का जीवन कुल 48 वर्ष का रहा है|इसी में उनकी रचना प्रक्रिया इसी विभिन्न साहित्यिक विधाओं में प्रतिफलित हुई कि कभी-कभी आश्चर्य होता है|कविता, उपन्यास, नाटक और निबंध सभी में उनकी गति समान है|किन्तु अपनी हर विद्या में उनका कवि सर्वत्र मुखरित है|वस्तुतः एक कवि की गहरी कल्पनाशीलता ने ही साहित्य को अन्य विधाओं में उन्हें विशिष्ट और व्यक्तिगत प्रयोग करने के लिये अनुप्रेरित किया|उनकी कहानियों का अपना पृथक् और सर्वथा मौलिक शिल्प है, उनके चरित्र-चित्रण का, भाषा saosthav का, वाक्यगठन का एक सर्वथा निजी प्रतिष्ठान है|उनके नाटकों में भी इसी प्रकार के अभिनव और श्लाघ्य प्रयोग मिलते हैं|अभिनेयता को दृष्टि में रखकर उनकी बहुत आलोचना की गई तो उन्होंने एक बार कहा भी था कि रंगमंच नाटक के अनुकूल होना चाहिये न कि नाटक रंगमंच के अनुकूल|उनका यह कथन ही नाटक रचना के आन्तरिक विधान को अधिक महत्त्वपूर्ण सिद्व कर देता है|

महाकवि जयशंकर प्रसाद की रचनाएँ –

  • काव्य – चित्राधार, कानन कुसुम, प्रेम-पथिक, महाराणा का महत्व, झरना, करुणालय, आंसू, लहर एवं कामायनी|
  • नाटक – सज्जन, कल्याणी परिणय, प्रायश्चित, राज्यश्री, विशाख, कामना, जन्मेजय का नागयज्ञ, स्कंदगुप्त, एक घूंट, चन्द्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी|
  • कथा संग्रह – छाया, प्रतिध्वनी, आकाश दीप, आंधी, इंद्रजाल|
  • उपन्यास – कंकाल, तितली, इरावती|
  • निबंध संग्रह – काव्य और कला तथा अन्य निबंध|

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“जो धनीभूत पीड़ा थी, मस्तक में स्मृति-सी छायी,

दुर्दिन में आँसू बनकर, वह आज बरसने आयी|”

“नील परिधान बीच सुकुमार, खुल रहा मृदुल अधखुला अंग

खिला हो ज्यों बिजली का फूल, मेघ-वन बीच गुलाबी रंग|”

“खग कुल कुल कुल-सा बोल रहा

किसलय का अंचल डोल रहा|”

दोस्तों महाकवि जयशंकर प्रसाद जी ने हिंदी काव्य में छायावाद की स्थापना की|जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई और वह काव्य की सिद्ध भाषा बन गई|वे छायावाद के प्रतिष्ठापक ही नहीं अपितु छायावादी पद्धति पर सरस संगीतमय गीतों के लिखनेवाले श्रेष्ठ कवि भी बने|काव्यक्षेत्र में प्रसाद की कीर्ति का मूलाधार ‘कामायनी’ है|आपको बताये खड़ी बोली का यह अद्वितीय महाकाव्य मनु और श्रद्धा को आधार बनाकर रचित मानवता को विजयिनी बनाने का संदेश देता है|यह रूपक कथाकाव्य भी है जिसमें मन, श्रद्धा और इड़ा के योग से अखंड आनंद की उपलब्धि का रूपक प्रत्यभिज्ञा दर्शन के आधार पर संयोजित किया गया है|उनकी यह कृति छायावाद और खड़ी बोली की काव्यगरिमा का ज्वलंत उदाहरण है|सुमित्रानंदन पन्त इसे ‘हिंदी में ताजमहल के समान’ मानते हैं|

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इस तरह देश की सेवा करते हुए महाकवि जयशंकर प्रसाद जी 15 नवम्बर सन 1937 ई को स्वर्ग सिधार गए|आप सभी ने आज इस आर्टिकल के माध्यम से जयशंकर प्रसाद जी के बारे में जाना और अच्छे से पढ़ा|अगर आप सभी ने अच्छे से मेरे इस post को read किये होंगे तो बेसक आपको जरुरी जानकारी मिल गयी होगी|अगर आपको कुछ पूछना हो तो नीचे message box में comment कर बता सकते हैं आपकी जरुर मदद की जाएगी|