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संत रैदास का जीवन परिचय

दोस्तों,  रैदास नाम से विख्यात गुरू रविदास जी का जन्म काशी में चर्मकार कुल में हुआ था|उनके पिता का नाम संतो़ख दास और माता का नाम कलसा देवी बताया जाता है|रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था|जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था और उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया|वे अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे|उनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे|आपको बताऊ रविदास जी बड़े सरल स्वाभाव के व्यक्ति थे|

रैदास जी का जीवन परिचय

बहुत से लोग जानना चाहते हैं कि रविदास यानि रैदास जी की जयंती कब होती है तो आपको बताये संत रैदास जी का जन्म 1398 से 1518 ई का माना जाता है|संत रैदास जी काशी में रहते थे|रैदास जी के गुरु रामानंद जी को मामा जाता है|नाभादास में रैदास के स्वरुप और उनकी चारित्रि का प्रतिपादन मिलता है|प्रियादास कृत भक्तमाल के टीका के अनुसार चित्तौड़ की झालारानी उनकी शिष्या थीं जो कि महाराजा सांगा की पत्नी थी|इसी को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि रैदास जी का जन्म विक्रम की शोलाह्वीं सदी के अंत तक चला जाता है|अब आइये इनके जीवन परिचय पर प्रकास डालते हैं|

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संत रैदास जी का जन्म –

पूरा नाम – संत रैदास|

उपनाम – रविदास|

जन्म – 1398 से 1518 ई|

जन्म स्थान – काशी|

रविदास का जीवन परिचय

रविदास भारत में 15वीं शताब्दी के एक महान संत, दर्शनशास्त्री, कवि, समाज-सुधारक और ईश्वर के अनुयायी थे|वो निर्गुण संप्रदाय अर्थात् संत परंपरा में एक चमकते नेतृत्वकर्ता और प्रसिद्ध व्यक्ति थे तथा उत्तर भारतीय भक्ति आंदोलन को नेतृत्व देते थे|ईश्वर के प्रति अपने असीम प्यार और अपने चाहने वाले, अनुयायी, सामुदायिक और सामाजिक लोगों में सुधार के लिये अपने महान कविता लेखनों के जरिये संत रविदास ने विविध प्रकार की आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश दिये|इस तरह अब आप सभी जान गए होंगे रविदास जी के बारे में|

रविदास के जीवन चरीत्र की पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नही है लेकिन दोस्तों बहुत से विद्वानों का ऐसा मानना है की श्री गुरु रविदासजी का जन्म 15 वि शताब्दी में भारत के उत्तर प्रदेश के कांशी में हुआ था|हर साल उनका जन्मदिन पूरण मासी के दिन माघ के महीने में आता है|संत रविदास को कभी संत, गुरु और कभी-कभी रविदास, रायदास और रुहिदास भी कहा जाता था|

“गुरु रैदास मिले मोहि पूरे, धुरसे कलम भिड़ी

सत गुरु सैन दई जब आके जोत रली|”

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रैदास के समय में स्वामी रामानंद काशी के बहुत प्रसिद्ध प्रतिष्ठित सन्त थे|रैदास उनकी शिष्य-मण्डली के महत्त्वपूर्ण सदस्य थे|प्रारम्भ में ही रैदास बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था|साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष सुख का अनुभव होता था|वह उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे|उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे|दोस्तों कुछ समय बाद उन्होंने रैदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से अलग कर दिया|रैदास पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग झोपड़ी बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे|

दोस्तों आपको बताये रैदास जी का विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित – भावना तथा सदव्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है|अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल दिया|अपने एक भजन में उन्होंने कहा –

“कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै

तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै|”

रैदास जी के पद –

“अब कैसे छूटे राम रट लागी,

प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी

प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा,

प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती

प्रभु जी, तुम मोती, हम धागा जैसे सोनहिं मिलत सोहागा|”

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दोस्तों आप सभी को बताना चाहता हूँ रैदास अनपढ़ कहे जाते हैं|संत-मत के विभिन्न संग्रहों में उनकी रचनाएँ संकलित मिलती हैं|राजस्थान में हस्तलिखित ग्रंथों में रूप में भी उनकी रचनाएँ मिलती हैं|रैदास की रचनाओं का एक संग्रह ‘बेलवेडियर प्रेस’,प्रयाग से प्रकाशित हो चुका |इसके अतिरिक्त इनके बहुत से पद गुरु ग्रन्थ साहिब में भी संकलित मिलते हैं|यद्यपि दोनों प्रकार के पदों की भाषा में बहुत अंतर है तथापि प्राचीनता के कारण ‘गुरु ग्रंथ साहब’ में संग्रहीत पदों को प्रमाणिक मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए|रैदास के कुछ पदों पर अरबी और फारसी का प्रभाव भी परिलक्षित होता है|रैदास के अनपढ़ और विदेशी भाषाओं से अनभिज्ञ होने के कारण ऐसे पदों की प्रामाणिकता में सन्देह होने लगता है|अत: रैदास के पदों पर अरबी-फ़ारसी के प्रभाव का अधिक संभाव्य कारण उनका लोकप्रचलित होना ही प्रतीत होता है|

रैदास जी के दोहे –

“जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात

रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात,

रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं,

तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि

हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा

दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा|”

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दोस्तों इस तरह आज इस post के माध्यम से आप सभी ने जाना और जानकारी प्राप्त की कि रैदास जी कौन थे उनका जन्म कब हुआ और उनके गुरु का क्या नाम था|अब मै समझ सकता हूँ आप सभी को मेरा ये आर्टिकल बेहद पसंद आया होगा अगर आप सभी ने अच्छे से मेरे इस पोस्ट को पढ़े होंगे तो जरुर आपको आवश्यक जानकारी मिल गयी होगी|अगर आपको कुछ पूछना हो तो नीचे message box में comment कर बता सकते हैं|