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हिंदी के प्रथम कवि का नाम और उनकी रचनाएँ

दोस्तों आज इस पोस्ट के माध्यम से मै आपको हिंदी जगत के प्रथम कवि का नाम बताने जा रहा हूँ साथ ही आपको उनकी रचनाओं से भी अवगत करूँगा उम्मीद है आप सभी को बेहद पसंद आएगा|वैसे आपको बताये सिध्द कवियों में सरहपा का स्थान मुख्य है|इनकी कर्मभूमि नालंदा (पटना के पास) विश्वविद्यालय थी|इनका नाम सरहपा (संस्कृत रूप शरहस्तपाद) पडने का कारण यह था कि ये शर (बाण) बनाने वाली एक नीच जाति की स्त्री के साथ रहते थे|सिध्दों की परंपरा में जो वस्तु ब्राह्मण धर्म में बुरी मानी जाती थी, उसे ये अच्छी मानते थे|इनके मत में डोंबी, धोबिन, चांडाली या बालरंडा के साथ भोग करना विहित था|

आपको बताये सरहपा की उक्तियाँ कण्ह की अपेक्षा अधिक तीखी हैं|इन्होंने भस्मपोत आचार्यों, पूजा-पाठ करते पंडितों, जैन क्षपणकों आदि सभी की निंदा की है|सिद्ध सरहपा (आठवीं शती) हिन्दी के प्रथम कवि माने जाते हैं|उनके जन्म-स्थान को लेकर विवाद है|एक तिब्बती जनश्रुति के आधार पर उनका जन्म-स्थान उड़ीसा बताया गया है|एक जनश्रुति सहरसा जि“ले के पंचगछिया ग्राम को भी उनका
जन्म-स्थान बताती है|महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने उनका निवास स्थान नालंदा और प्राच्य देश की राज्ञीनगरी दोनों ही बताया है|उन्होंने दोहाकोश में राज्ञीनगरी के भंगल (भागलपुर) या पुंड्रवद्र्धन प्रदेश में होने का अनुमान किया है|अतः सरहपा को कोसी अंचल का कवि माना जा सकता है|

हिंदी साहित्य की रचनाये

सरहपा के बारे में (हिंदी के प्रथम कवि) –

सरहपा का चैरासी सिद्धों की प्रचलित तालिका में छठा स्थान है|उनका मूल नाम ‘राहुलभद्र’ था और उनके ‘सरोजवज्र’, ‘शरोरुहवज्र’, ‘पद्म’ तथा ‘पद्मवज्र’ नाम भी मिलते हैं|वे पालशासक धर्मपाल (770-810 ई.) के समकालीन थे|उनको बौद्ध धर्म की वज्रयान और सहजयान शाखा का प्रवर्तक तथा आदि सिद्ध माना जाता है|वे ब्राह्मणवादी वैदिक विचारधारा के विरोधी और विषमतामूलक समाज की जगह सहज मानवीय व्यवस्था के पक्षधर थे|उनकी शिक्षा नालंदा-विहार में हुई थी तथा अध्ययन के उपरांत वे वहीं प्रधान पुरोहित के रूप में नियुक्त हुए|अवकाश-प्राप्ति के बाद श्रीपर्वत, गुंटूर (आंध्रप्रदेश) को उन्होंने अपना कार्य क्षेत्रा बनाया|

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रचनाएँ –

दोस्तों आपको बताना चाहूँगा डॉ. विश्वंभरनाथ उपाध्याय ने उन पर दो प्रामाणिक पुस्तकें सरहपा (विनिबंध, 1996 ई.) तथा सिद्ध सरहपा (उपन्यास, 2003 ई.)लिख कर प्रकाशित करवाई हैं|तिब्बती ग्रंथ स्तन्-ग्युर में सरहपा की 21 कृतियाँ संगृहीत हैं|इनमें से 16 कृतियाँ अपभ्रंश या पुरानी हिन्दी में हैं, जिनके अनुवाद भोट भाषा में मिलते हैं|

हिंदी साहित्य के प्रथम कवि

(1) दोहा कोश-गीति
(2) दोहाकोश नाम चर्यागीति
(3) दोहाकोशोपदेश गीति
(4) क.ख. दोहा नाम
(5) क.ख. दोहाटिप्पण
(6) कायकोशामृतवज्रगीति
(7) वाक्कोशरुचिरस्वरवज्रगीति
(8) चित्तकोशाजवज्रगीति
(9) कायवाक्चित्तामनसिकार
(10) दोहाकोश महामुद्रोपदेश
(11) द्वादशोपदेशगाथा
(12) स्वाधिष्ठानक्रम
(13) तत्त्वोपदेशशिखरदोहागीतिका
(14) भावनादृष्टिचर्याफलदोहागीति
(15) वसंत- तिलकदोहाकोशगीतिका
(16) महामुद्रोपदेशवज्रगुह्यगीति|

दोस्तों इतना ही नही उक्त कृतियों में सर्वाधिक प्रसिद्धि दोहाकोश को ही मिली है|अन्य पाँच कृतियाँ उनकी संस्कृत रचनाएँ हैं –

(1) बुद्धकपालतंत्रपंजिका
(2) बुद्धकपालसाधन
(3) बुद्धकपालमंडलविधि
(4)त्रैलोक्यवशंकरलोकेश्वरसाधन एवं
(5) त्रैलोक्यवशंकरावलोकितेश्वरसाधन|

राहुल सांकृत्यायन ने इन्हें सरह की प्रारंभिक रचनाएँ माना है जिनमें से चौथी कृति के दो और अंशों के भिन्न अनुवादकों द्वारा किए गए अनुवाद स्तन्-ग्युर में शामिल हैं जिन्हें स्वतंत्र कृतियाँ मानकर राहुलजी सरह की सात संस्कृत कृतियों का उल्लेख करते हैं|

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खड़ी बोली के प्रथम कवि –

आपको और भी कई जानकारी साझा कर रहा हूँ|भारतेंदु युग से हिन्दी-साहित्य में आधुनिकता की शुरूआत हुई|इसी दौर में बड़े पैमाने पर भाषा और विषय-वस्तु में बदलाव आया|इतिहास के उस कालखंड में, जिसे हम भारतेंदु युग के नाम से जानते हैं, खड़ीबोली हिन्दी गद्य की भाषा बन गई लेकिन पद्य की भाषा के रूप में ब्रजभाषा का बोलबाला कायम रहा|अयोध्या प्रसाद खत्री ने गद्य और पद्य की भाषा के अलगाव को गलत मानते हुए इसकी एकरूपता पर जोर दिया|पहली बार इन्होंने साहित्य जगत का ध्यान इस मुद्दे की तरफ खींचा, साथ ही इसे आंदोलन का रूप दियाहिंदी पुनर्जागरण काल में स्रष्टा के रूप में जहाँ एक ओर भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसा प्रतिभा-पुरुष खड़ा था|तो दूसरी ओर द्रष्टा के रूप में अयोध्याप्रसाद खत्री जैसा अद्वितीय युगांतरकारी व्यक्तित्व था|

इसी क्रम में खत्री जी ने ‘खड़ी-बोली का पद्य` दो खंडों में छपवाया|इस किताब के जरिए एक साहित्यिक आंदोलन की शुरूआत हुई|हिन्दी कविता की भाषा क्या हो, ब्रजभाषा अथवा खड़ीबोली हिन्दी|जिसका ग्रियर्सन के साथ भारतेंदु मंडल के अनेक लेखकों ने प्रतिवाद किया तो फ्रेडरिक पिन्काट ने समर्थन|इस दृष्टि से यह भाषा, धर्म, जाति, राज्य आदि क्षेत्रीयताओं के सामूहिक उद्घोष का नवजागरण था|ये खड़ी बोली पद्य की चार शैलियाँ मानते थे- मौलवी, मुंशी, पंडित और अध्यापक शैलियाँ|इन्होंने खड़ी बोली का पद्य (1880 ई., दो भाग) में उक्त शैलियों की कविताओं का संकलन किया था|

हिंदी भारतीय गणराज की राजकीय और मध्य भारतीय- आर्य भाषा है|सन 2001 की जनगणना के अनुसार, लगभग 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं, जबकि लगभग 42.20 करोड़ लोग इसकी 50 से अधिक बोलियों में से एक इस्तेमाल करते हैं|सन 1998 के पूर्व, मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आँकड़े मिलते थे, उनमें हिन्दी को तीसरा स्थान दिया जाता था|

भाषाशास्त्र की दृष्टि से खड़ी बोली शब्द का प्रयोग दिल्ली और मेरठ के समीपस्थ ग्रामीण समुदाय की ग्रामीण बोली के लिए होता है|ग्रियर्सन ने इसे ‘वर्नाक्यूलर हिन्दुस्तानी’ तथा सुनीतिकुमार चटर्जी ने ‘जनपदीय हिन्दुस्तानी’ कहा है|खडी बोली नागरी लिपि में ही लिखी जाती है|हिंदी की रूपरेखा जानने के लिए खड़ी बोली का ज्ञान अति आवश्यक है|भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से खड़ी बोली ही स्टैण्डर्ड हिन्दी, उर्दू तथा हिन्दुस्तानी की मूलधार बोली है|साहित्यक सन्दर्भ में कभी-कभी अवधी ब्रज आदि बोलियों के साहित्य से अलगाव करने के लिए आधुनिक हिन्दी साहित्य को ‘खड़ी बोली सहित्य’ से अभिहित किया जाता है और इस प्रसंग में खड़ी बोली शब्द ‘स्टैण्डर्ड हिन्दी’ का समानार्थक हो जाता है|प्रथम को हम ‘खड़ी बोली’ शब्द का विशिष्ट अर्थ और द्वितीय को सामान्य अर्थ कह सकते है|

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दोस्तों मै समझ सकता हूँ आप सभी को मेरा ये पोस्ट बहुत पसंद आया होगा अगर आपको मेरा ये पोस्ट अच्छा लगा हो तो नीचे comment कर जरुर बताये साथ ही अगर आपको कुछ पूछना हो तो comment box में बता सकते हैं|